मैं पिंकी हूँ

मैं पिंकी हूँ

मैं एक मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार में पैदा हुई,  पिताजी तीन भाई थे । भाइयों में सबसे बड़े हमारे ही पिता जी थे जो पेशे से होमगार्ड और किसान थे । मैं उनकी पहली संतान थी ।  सबसे बड़े होने के नाते मुझे बहुत जल्दी जिम्मेदारियों का एहसास करा दिया गया । कहीं ना कहीं ईश्वर ने मुझे जिम्मेदारियां उठाने की शक्ति पहले से दे रखी थी ।  समय बदलता गया जिम्मेदारियां बढ़ती गईं ।  हमारे घर में आंगनबाड़ी केंद्र लगता था वहां  से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला ।19वीं सदी में पुरुष वर्ग ही ज्यादा पढ़ा लिखा होता था महिलाएं बहुत कम इसलिए हमारी माता श्री भी  निरीक्षर थीं । पढ़ाई के लिए प्रोत्साहन तो बहुत  करती थीं  लेकिन सहयोग नहीं । 

घर में खेती बाड़ी का काम अधिक होता था तो कभी -कभार खेत भी जाना पड़ता था। पढ़ाई पर विशेष ध्यान था परिवार का ,लेकिन वही होता है ना कि आज काम ज्यादा है ,और “समय कम ,नहीं  गए तो फसल पिछड़ जाएगी, तो जाना पड़ता था । “स्कूल में जब और लड़कियों को देखती उनका जीवन हमसे अलग है । शहरों में रिश्तेदार रहते हैं। छुट्टियों में वहां घूमने जाती हैं  और वहाँ वो  शुद्ध खड़ी बोली में बात करती हैं  ।  यह सब सुनकर बहुत अच्छा लगता था और उत्सुकता होती थी कि हमारा भी कोई रिश्तेदार शहर में होता तो हम भी जाते ।कुछ नया सीखते हर पल नया सीखने की जिज्ञासा वाला मन रखती थी मै, कल भी ,और आज भी । हमारा आना जाना ननिहाल तक सीमित था, इसके आगे दुनिया नहीं देखी तो क्या जाने? बस टीवी में देखते थे, कि दुनिया बहुत बड़ी है एक से एक कीमती गाड़ियां होटल होते हैं ।

जेब्रा रोड क्या होती है?  यह तो सिर्फ किताबों में पढ़ा था । जब मैं छठवीं कक्षा में आई तो स्कूल हमारे गांव से काफी दूर था वहां जितनी भी लड़कियां पढ़ने जाती थीं,  सभी साइकिल से जाती थी । मुझे साइकिल सीखने में 2 साल लगे क्योंकि मैं बचपन से ही  संकोची और डरपोक थी  । कभी अध्यापक से छुट्टी मांगनी हो तो सहेली को लेकर जाती।जब कभी स्कूल में राष्ट्रीय पर्व होते मेरा मन करता कि मैं भी भाग लूं मेरे अंदर जज्बा है ,करने का ,लेकिन संकोच और डर यही दोनों मुझे हमेशा रोकते रहे, जो बच्चे बोलने में तेज थे ,अध्यापक भी उन्हें ही कार्यक्रम में भाग लेने के लिए उत्साहित करते ,शायद हमारे ऊपर भी एक बार नजर गई होती तो मैं इतनी संकोची और डरपोक न होती । “इसलिए तो पढाई के दौरान एक बार भी स्टेज पर नहीं खड़ी हुई एकाध बार सुबह की प्रार्थना में किसी लड़की ने खींच लिया तो वो अपवाद है । “

और ऐसा नहीं है कि मैंने मेहनत नही की, कोशिश नहीं की ,जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में थी तभी विवाह हो गया लेकिन हमने पढाई जारी रखी जब स्नातक पूर्ण किया उसके बाद घर परिवार की जिम्मेदारियों के साथ साथ अपने सपनों को पूरा करने का भरसक प्रयास किया। महिला पुलिस कर्मी को देखती तो मन में राष्ट्र भक्ति ऐसे हिलोरे भरती की अब तो देश रक्षा के लिए पुलिस में ही जाना है। जिसके लिए एक वर्ष तैयारी किया ,लेकिन परिक्षा केंद्र दूर होने के कारण जा नहीं पाई। 

“कोई स्वास्थ्य कर्मी गाँव में आ जाता तो स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता अभियान में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने लगती” ।  जिसे मैंने सपनों में ही नहीं असल जिंदगी में भी जिया यूनीसेफ के द्वारा चलाए जाने वाले पोलियो ,टीकाकरण, स्वास्थ्य जागरुकता अभियानों में लगभग आठ साल काम एक सपना पूरा हुआ और बहुत कुछ सीखा । साथ ही सजने संवरने का शौक किस महिला को नहीं होता है । अब तो साज श्रंगार सीखकर आप अपने घर की अर्थव्यवस्था भी मजबूत बना सकते हो । फिर  क्या? ब्युटीशियन कोर्स किया ,और स्वास्थ्य के साथ -साथ सजने संवरने के नुस्खे भी बताने लगी । “जब लाकडाउन हुआ तो मेरा रुझान लेखन की तरफ बढ़ा। और मैं लेख लिखने लगी स्वास्थ्य सम्बंधित, रिश्तों से सम्बन्धित”। 

एक दिन फेसबुक पर मैंने कवयित्री अनामिका अम्बर जी की कविता उन्हें स्टेज पर पढ़ते हुए सुनी ,सुनकर बहुत अच्छा लगा  । दिल से एक आवाज आई कि कविता लिखकर अगर मैं पढूंगी तो मेरे दो सपने पूरे हो जाएंगे एक तो लेखन का दूसरा संगीत का । कुछ दिन तो मैंने यूट्यूब पर बहुत सारे कवि कवयित्रियों को सुना फिर यूट्यूब से ही मात्रा गणना, साहित्य से सम्बन्धित सभी जानकारी हांसिल की और जून 2022 से कविता ,गीत ,गजल ,चौपाई, छंद लिखना सीखने लगी। वर्तमान में चूंकि मुझे सामाजिक कार्य करना पसंद है । इसके लिए “उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन” और अपने स्तर से महिलाओं को सशक्त बनाने ,रोजगार से जोड़ने की कोशिश करती रहती हूँ  ।क्योंकि मैं नहीं चाहती की मेरी तरह जब समय निकल जाए तब इंसान सपनों को पूरा करने की कोशिश करे सही समय पर काम हो तो इंसान अपने जीवन काल के मध्य ही सारे सपने पूरे कर दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाता है। 

“मुझे सही दिशा दिखाने वाला कोई नहीं था  । लेकिन मुझे जितनी जानकारी है वह बांटकर मैं अपने जैसी अपने गाँव की महिलाओं को दिशा दिखाकर उन्हें इस लायक बना सकूँ कि वह खुद आने वाली पीढ़ी की प्रेरणा बन सकें। “अतं में  अपने अनुभवों से मै यही कहूंगी कि आपके अंदर कुछ करने का हौशला हो तो आप अपनी मेहनत से अपने सारे सपने पूरे कर सकते हो । बस पाने का जुनून हो। 

पिंकी अरविंद प्रजापति

सिधौली सीतापुर उत्तर प्रदेश

8953425937

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