कुछ कथाएं जीवन की अंतहीन सच्चाई को प्रदर्शित कर हमारी सोच को एक नए पथ पर प्रशस्त करती हैं । सुरीली आवाज में गायी जाने वाली एक पुरानी रागिनी की तरह सुधा की कहानी आज भी उसके अपनों के शब्दों में जुड़कर समय के साथ गूँजती है । यह कहानी है लगभग पचास वर्ष के एक अटूट बंधन की है जिसमें प्रेम का स्थान धैर्य और कर्तव्य ने ले लिया था ।
कभी-कभी अत्याचार और दमन को हम अपनी खामोशी में छिपा लेते हैं , ढलते हुए सूर्य को अपना अस्तित्व बना लेते हैं , अपने नेत्र के अश्रुओ को सुखा देते हैं और सभी की सोच में एक नई पटकथा लिख जाते हैं । मेरी मां की परम मित्र सुधा की कहानी लिखते हुए आज भी मेरे हाथ कांप रहे हैं और धड़कन तेज हो गई है ।
दिल्ली शहर के भीतर बसे उस छोटे से गाँव में जहाँ कभी कच्चे रास्ते और नीम के पेड़ थे ,आज भी कई बड़ों के मुँह से सुधा के नाम की फुसफुसाहट सुनाई देती है । जब ढलता हुआ सूर्य अपने नारंगी रंग में स्वयं को समेटता है और किसी गुजरती हुई गाय के गले में बंधी हुई घंटी की आवाज सुनाई देती है तो उस क्षेत्र में बसने वाले पुराने लोग जाने अनजाने सुधा और उसके पति रामनाथ को याद कर आपस में उस चित्र को पुन: चित्रित कर लेते हैं ।
सेना में कार्य करने वाले रामनाथ एक ऐसा नाम थे जिनकी उपस्थिति और गुस्सा , मित्रों और संबंधियों में डर पैदा कर देता था । वह गांव में सबकी मदद करते थे इस बात को लेकर उनका सम्मान तो था , पर उनका गुस्सा सभी के लिए भय का एक कारण भी था । पत्नी को बंदिनी के समान समझने वाले रामनाथ का हाथ अक्सर सुधा पर उठ जाया करता था । सरकारी सेवा में कार्यरत सुधा का विवाह एक पारंपरिक विवाह था । जहाँ कन्यादान और सात फेरे रस्मों की तरह निभाए गए थे । सुधा ने सोचा था कि यह रिश्ता प्रेम और समझदारी से भरा होगा, लेकिन जल्द ही उसकी उम्मीदें टूट गईं।
रामनाथ का स्वभाव कठोर था और छोटी-छोटी बातों पर वे अक्सर अपना आपा खो देते थे। उनकी मीठी बातें अक्सर कड़वी गालियों में बदल जातीं धी और प्रेम की जगह उनके व्यवहार में हमेशा एक अनदेखी दीवार बनी रहती । सात भाई बहनों के परिवार में बड़ी पुत्री की तरह पली हुई सुधा उनके आगे कभी भी मुंह ना खोलती ।
रिश्तेदार , मित्र एवं पड़ोसी सुधा की सहनशीलता पर हैरान होते थे ।वे देखते कि कैसे वह हर मार-पिटाई के बाद भी अगली सुबह उठकर वह दिन प्रतिदिन के कार्यकलापों में तल्लीन हो जाती और जीवन संगिनी के रूप में रामनाथ की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ती । जब भी कोई उससे इस व्यवहार के प्रति रोष उत्पन्न करने और आक्रामक होने को कहता तो वह बस मुस्कुरा देती और कहती, “यह मेरा धर्म है ” । उसके मन में क्या चलता था, यह कोई नहीं जानता था ।
क्या वह रामनाथ से प्रेम करती थी? क्या वह सचमुच मानती थी कि यह उसका कर्तव्य है? या फिर उसने अपने भाग्य को स्वीकार कर लिया था? इन प्रश्नों के उत्तर उसके कई साथियों ने ढूंढने की कोशिश की पर शायद उसके कर्तव्य भाव को देखकर वह शांत हो जाते और सुधा वापस दैनिक कार्यों में जुट जाती ।
समय का पंछी अपनी पंखों से उड़ान भरता रहा । पांच बच्चों के परिवार में अपने तीनों पुत्रों और दोनों पुत्रियों के बीच जीवन ढूंढती हुई सुधा अपने वैवाहिक जीवन के 50 वर्ष कब पार कर गई उसे स्वयं भी ना पता चला । युवावस्था कब किसके साथ रही । धीरे-धीरे उम्र ढलने के साथ रामनाथ बूढ़े हो गए और उनका शरीर अब कमजोर पड़ने लगा था । लेकिन उनका स्वभाव नहीं बदला था । सुधा ने भी अपनी आधी सदी रामनाथ की सेवा में बिता दी थी । उसने उनके बीमार पड़ने पर रात-रात जागकर देखभाल की , उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखा और कभी भी शिकायत का एक शब्द नहीं कहा ।
फिर एक दिन रामनाथ ने अपनी अंतिम सांस ली । गाँव में मातम छा गया । सुधा ने रामनाथ के अंतिम संस्कार की सारी रस्में निभाईं और इस दौरान उसकी आँखों में एक भी आँसू नहीं आया । गांव के हर व्यक्ति ने इसे उसकी मजबूत इच्छाशक्ति माना और उसकी अटूट श्रद्धा का प्रतीक समझा ।
कुछ दिनों बाद जब घर में सब कुछ सामान्य होने लगा तो सुधा का मंझला बेटा राजेश, जो अपने पिता के व्यवहार को लेकर हमेशा चिंतित रहता था और अपनी माँ के दर्द को महसूस कर सकता था , उसने अपनी मां के पास बैठकर धीरे से पूछा, “माँ, क्या आप पिताजी से प्रेम करती थीं ?”
सुधा ने एक पल के लिए अपनी नजरें उठाईं और कुछ क्षण के लिए वह शांत हो गई । ऐसा लगा जैसे पिछले 50 वर्ष एक इतिहास की तरह उसके नयनो में उतर आए थे । यादों की पिटारे से बाहर निकलते हुए एक लंबा सन्नाटा था जिसमें सिर्फ हवा की सरसराहट सुनाई दे रही थी ।
उसने पुनः अपनी नजरें झुका लीं । उसकी आवाज शांत थी लेकिन उसमें एक ऐसी सच्चाई थी जो सीधे दिल को छू गई । उसने कहा ” मैं मानती हूं ऐसे व्यक्ति से कौन प्रेम कर सकता है पर यह सच है कि मैंने उनका सम्मान किया और अपने कर्तव्यों को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया “।
राजेश को समझ नहीं आया कि वह क्या कहे । उसकी माँ ने क्या बिना प्रेम किये अपने कर्तव्यों का धैर्य पूर्वक निर्वहन किया था ? क्या उसने अपने जीवन को बिना प्रेम की चादर में समेटे हुए सहनशीलता के साथ समर्पित कर दिया था ?
सुधा की कहानी प्रेम की नहीं अपितु कर्तव्य, त्याग और सहनशीलता की है । यह कहानी एक ऐसी स्त्री की है जिसने इस समाज के ताने-बाने में अपने जीवन के रिश्ते और खालीपन को बांध दिया था और उसमें एक शांत और अदृश्य नायिका की तरह अपने जीवन को व्यतीत कर दिया ।
डॉक्टर सुप्रीति चावला
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