साप्‍ताहिक प्रतियोगिता साहित्‍य सरोज

कहानी प्रतियोगिता में किरण की कहानी प्रेम का इंद्रधनुष

होली का दिन था। आसमान में उड़ते हुए लाल, पीले , सतरंगी, हरे , नीले और
बैंगनी रंग के गुलाल मानो इंद्रधनुषी छटा बिखेर रहे थे। बच्चे , बूढ़े युवा सभी का उत्साह देखते ही बनता था। जहाँ बड़े बुजुर्ग हाथों में गुलाल लिए एक दूसरे को लगा रहे थे वहीं बच्चे कहीं दीवारों की ओट में छिपकर तो कहीं छत के ऊपर अपनी अपनी पिचकारियों और रंगों से भरे हुए गुब्बारों के साथ टोलियों में अलग – अलग मोर्चा संभाले हुए थे।

माधवी खिड़की के पास बैठी चाय की चुस्कियों के साथ लोगों को होली के रंगों में सरोबार होते देख रही थी। एक ओर जहाँ सभी अपने घरों में होली के हर्षोल्लास में डूबे हुए थे तो वहीं उसके घर में सन्नाटा था। खिड़की के बाहर टकटकी लगाए उसकी आँखें किसी की प्रतीक्षा कर रही थीं। बाहर की इंद्रधनुषी छटा उसे रह – रह कर किसी की याद दिला रही थी ।

वह धीरे से उठी और स्टोर की अलमारी से एक पुरानी स्कैच बुक उठा लाई। उसके पन्ने पलटते हुए उसके हाथ इंद्रधनुष के चित्र पर रुक गए और वह वर्तमान से अतीत में जा पहुंची।उसे आज भी वो दिन याद था जब शिमला के स्कूल में उसने बतौर कला शिक्षिका के रूप में कार्यभार संभाला था।

माधवी को बचपन से ही प्रकृति से बेहद लगाव था, और यहाँ की हरियाली देखकर उसका मन खुशी से भर गया था। एक दिन, जब वह विद्यालय से निकली, तो अचानक बारिश शुरू हो गई।

बारिश से बचने के लिए उसने इधर -उधर नजरें घुमाईं तो उसे एक चाय की टपरी दिखाई दी। वहाँ, एक शख्स बैठा किताब पढ़ रहा था। गहरे नीले रंग की शर्ट , चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान लिए, वह सबसे अलग लग रहा था। उसके पास एक खाली कुर्सी देखकर माधवी ने उससे पूछा, “क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”

“बिल्कुल,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।

“आप भी बारिश से बचने आए हैं?” माधवी ने बात आगे बढ़ाई।

“नही, मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और आज भी जब आया तो अचानक से बारिश शुरू हो गई ।” शिमला की बारिश का क्या ही भरोसा … वह हँसा, “वैसे, मैं जतिन हूँ और आप?”

“मैं माधवी। यहाँ हाल ही में आई हूँ, स्कूल में पढ़ाने के लिए।”
“फिर तो आपको यह जगह बहुत पसंद आने वाली है”,जतिन ने चाय पीते हुए कहा।
“लगता है आपको किताबों में अच्छी खासी दिलचस्पी है”, माधवी ने किताब की ओर देखते हुए कहा।

उस पहली मुलाकात में माधवी जतिन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी।

माधवी अक्सर समय मिलने पर प्रकृति की छटा पन्नों पर उतारने के लिए निकल पड़ती थी। ऐसे ही एक दिन पहाड़ों के मध्य से इंद्रधनुष को निकलता देखकर वह उसकी तस्वीर बना रही थी तो एक चिर परिचित आवाज ने उसे पीछे मुड़कर देखने को विवश कर दिया।

” बहुत सुंदर तस्वीर बना रही हो,एकदम जीवंत सी लग रही है।”

“अरे ! जतिन जी आप , ऐसे अचानक यहाँ मिल जाओगे ,कभी सोचा ही नहीं था।”

” आसमान को निहारना मेरे मन को सुकून प्रदान करता है। इसके गहरे नीले रंग को देखता हूँ तो मुझे इसमें जीवन की गहराई और शांति मिलती है,” जतिन ने कहा।

“वैसे आपको नीले के अलावा और कौन से रंग पसंद हैं?” माधवी ने अपनी तस्वीर में रंग भरते हुए पूछा।

सच कहूँ तो मुझे केवल नीला रंग ही भाता है। यह रंग मुझे शांति और सुकून से भर देता है। आपका पसंदीदा रंग कौन सा है ? जतिन ने पूछा।

मुझे तो सभी रंग पसंद हैं या यूँ कहूँ कि
रंग हमारे मनोभावों को प्रकट करते हैं।
यह आपकी स्थिति पर निर्भर करता है कि आप किन परिस्थितियों से गुजर रहे हो।

जैसे आप प्रसन्न हो तो आपको पीला, गुलाबी, लाल, नारंगी इत्यादि उष्ण और चमकीले रंग आकर्षित करेंगे।
अगर आप कुछ अलग और नया करने या सोचने वालों में से हो तो आप हरे रंग को पसंद करेंगे क्योंकि हरा रंग प्रकृति और जीवन से जुड़ा है, आपको सुकून प्रदान करता है।
दुखी, निराश ,गंभीर व्यक्तित्व वालों को गहरे रंग जैसे काला, बैंगनी, स्लेटी ,गहरा नीला अच्छे लगते हैं।

ये सभी रंग एक दूसरे के पूरक होते है।
जीवन भी तो रंगों का मिश्रण ही है। ये हम पर निर्भर है कि हम किस रंग को देखना चाहते हैं। रंगों का इंद्रधनुष हमारे मन के भीतर भी है। मन से सभी विषाद, विकार की धूल को हटाकर प्रेम और निष्पाप भाव से देखें तो ये इंद्रधनुष भी बारिश के बाद आसमान के साफ होने के बाद दिखाई देने वाले इंद्रधनुष की भांति ही सुंदर दिखाई देने लगता है।

समय बीतने लगा। माधवी और जतिन की मुलाकातें बढ़ती गईं। कभी पहाड़ों की चोटी पर सूरज को डूबते देखते, तो कभी माल रोड पर घूमते हुए देर तक बातें करते। हर मुलाकात के साथ उनका रिश्ता और गहरा होता जा रहा था। फिर एक दिन दोनों परिणय सूत्र में बंध गए।

सब कुछ खूबसूरत चल रहा था, लेकिन जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता। एक दिन जतिन को कंपनी के काम के सिलसिले में मुंबई जाना पड़ा।

दिसंबर 1993 का वो मनहूस महीना उसके जीवन में काली घटा बनकर छा गया।मुंबई साम्प्रदायिक हिंसा जतिन के जीवन को भी लील गई। मुंबई ब्लास्ट के बाद भड़की हिंसा ने न जाने कितने निर्दोष लोगों के जीवन को भस्म कर दिया।

अब माधवी अपने 10 साल के बेटे मुकुल के साथ अकेली रह गई थी।
उसके जीवन के इंद्रधनुष को मानो किसी काले साए ने अपने आगोश में ले लिया हो। वक्त के साथ अब मुकुल भी बड़ा हो गया था। अपने पिता जतिन की ही भांति शांत, गंभीर और सुलझे हुए व्यक्तित्व वाला।

बंगलोर में आई टी की परीक्षा पास करते ही अमेरिका की एक बड़ी कम्पनी की तरफ से उसे नौकरी का प्रस्ताव आया।
एक बार तो माधवी को लगा कि उसका सब कुछ छूटता ही जा रहा है। उसने बेटे की खुशी और सुनहरे मौके को ध्यान में रखते हुए दिल पर पत्थर रखते हुए जाने की अनुमति दे दी।

“आँटी, माँ ने आपके लिए गुजिया भेजी हैं। ” पड़ोस के चिंटू की आवाज उसे अब अतीत से वर्तमान में ले आई थी।

हैप्पी होली आँटी, कहते ही वह गुजिया मेज पर रखते ही गली की तरफ दौड़ गया। यह देखकर माधवी के मुख पर एक हल्की सी मुस्कान फैल गई।

मुकुल को भी तो होली खेलने की ऐसे ही तत्परता रहती थी। ऐसे में उसे खाने
पीने की भी सुध नहीं रहती थी। रह- रह कर उसे मुकुल का बचपन याद आ रहा था। माधवी आँखें बंद किए हुए बीते लम्हों को याद कर ही रही थी कि अचानक से किसी ने उसकी आँखों को अपनी दोनों हथेलियों से बंद कर दिया।

मुकुल ! वो खुशी से मानो चहक पड़ी हो।
“तुमने बताया भी नहीं कि आ रहे हो”
” अगर आपको पहले बता देता तो अपनी माँ के चेहरे पर आई खुशी को कैसे देख पाता?”

दो साल बाद बेटे से मिलकर माधवी के मन का इंद्रधनुष जिसे काली छाया ने ढक लिया था , आज बाहर आकर उसके चेहरे पर सतरंगी आभा बिखेर रहा था।
कभी वह मन के इंद्रधनुष को देख रही थी तो कभी इंद्रधनुष की तस्वीर को।

 किरण बाला (चण्डीगढ )

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