चोरी दंड और जुर्माना

कहानी प्रतियोगिता में रामभोले शर्मा की कहानी देश के मुर्दे नानामऊ घाट

सोनेलाल उर्फ सन्नू आरोही क्रमानुसार अपने पांच भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर थे।उन्हें छोड़कर सभी भाई-बहनों के हाथ लाल-पीले हो चुके थे।किन्तु दुर्भाग्यवश बेचारे सन्नू शादी के लड्डू की प्रतीक्षा में अभी तक सपनों की खटिया बुन रहे थे।मां-बाप लगभग दस साल पहले अपने लाडले बेटे के पाणिग्रहण संस्कार का अधूरा ख्वाब लिए अनंत यात्रा हेतु प्रस्थान कर चुके थे।जवान बेटी का विधवा हो जाना और बेटे का कुँवारा रह जाना दुनिया के दारुण दुखों में से एक हैं।दरअसल उनकी शादी न होंने की वजह उनकी शक्ल-सूरत थी।यद्यपि रंग गोरा था।लम्बाई भी ठीकठाक ही थी।सिर पर मौजूद बालों की उपस्थिति और कालिमा अल्पमत में आ चुकी थी ।जो कि अब रंगरोगन की फरमाइश कर रही थी। खैर यहाँ तक गनीमत थी किन्तु उनके मुखमण्डल को देखकर वैज्ञानिकों के उस तर्क पर यकीन करने पर विवश होना पड़ता था कि आदमी के पूर्वज निश्चय ही बन्दर रहे होंगे।अब इसमें भला बेचारे सन्नू का क्या दोष था?
उनके अग्रज भ्रातागण लगभग आठ वर्ष पहले ही गांव से अपने हिस्से का खेत-टपरिया बेचकर शहर निवासी हो लिए थे जिनके दर्शन अब होली-दीवाली पर भी दुर्लभ ही थे।सन्नू के हिस्से में लगभग दस बीघा खेत था जो कि एक मध्यम परिवार के लिए पर्याप्त था। किंतु…हाय रे किस्मत! कोई तलाशी नहीं।कोई दिया जलाने वाला नहीं।डेहरी पर खड़े होकर सांझ को कोई इंतज़ार करने वाला नहीं।अक्सर सवेरे को चूल्हा जलाते भोजनोपरांत जो बच जाता उसी बासी भोजन से शाम को पेट पूजा हो जाती।यदि आलस्य शरणम गच्छामि हुए तो फिर तय अर्ध उपवास।। उस पर पोर पर प्रकट होते ही रक्षपाल जैसे जुल्मी लोग पत्नी द्वारा मिलने वाले अलौकिक सुख की चर्चा करके जले पर नमक छिड़कने में कोई कोताही नहीं बरतते।कहते आज खाने के बाद गोलई की अम्मा ने कहा कि “तुम्हें हमारी कसम है ये एक बेला दूध तो पी लो।इतना कहने के बाद में वे सन्नू की ओर देखकर एक आँख दबाना कतई नहीं भूलते। सन्नू ने भागवत प्रवचनकर्ताओं के श्रीमुख से कई बार सुना था कि गंगाजी का स्नान करने से हर मनोकामना पूरी होती है। तबसे सन्नू जी ने हर पूरननमासी और अमावस्या को नियमित गंगा स्नान शुरू कर दिया जो कि आज तक अबाध जारी था।मौनी अमावस्या को वे व्रत का पूरी निष्ठा से पालन करते हुए घर से मौन प्रस्थान करते और स्नानोपरांत वे फोन सहित साइलेंट मुद्रा में ही घर लौटते।पूस की हाड़ कँपा देने वाली सर्दी में कटारी की तरह शरीर को काटने वाला पानी भी उनकी श्रद्धा को नहीं डिगा पाया।जबकि इस समय बड़े-बड़े धुरंधर श्रद्धालु तुलसी बाबा की चौपाई दरस-परस अउ मज्जन पाना में से, ‘मज्जन’को छोड़कर पुण्य कमाने के लिए शेष अन्य विकल्पों का ही अनुशरण करते नजर आते हैं।परंतु न जाने क्यों इस भक्त पर मां गंगा की भी कृपा नहीं हो पाई? निर्जला एकादशी से लेकर कितने अन्य व्रत-उपवास किए किन्तु सब निष्फल।रामदास के परामर्श पर एक बार तो वे धरती माता को दंडवत नापते हुए एक देवस्थान तक हो आए।जिसमें उनके कोहनी और घुटने तक छिल गए।जहाँ जिसने जो कुछ बताया सब किया।बेचारे ने कितने ओझा,गुनिया, फकीरों की ड्यौढियाँ मंझाईं,कई बार दक्षिणा और सामग्री के नाम पर ठगे भी गए,किन्तु मामला वही ढाक के तीन पात।तेंतीस कोटि देवी-देवताओं से लेकर पीरों पैगम्बरों आदि तक उन्होंने ऐसा कोई नहीं छोड़ा जिसको अपनी फरियाद न सुनायी? किन्तु सब निष्ठुर निकले।..
गाँव की तरुणियों के सामने अपने निपट संकोची स्वभाव की वजह से वे कभी प्रणय निवेदन करने का दुस्साहस नहीं कर पाए।वैसे उन्हें कोई स्वयं घास डाले ये संभव नहीं था क्योंकि इसमें उनका चौखटा आड़े आ जाता था।

अब सन्नू बयालीसवें बसन्त में दाखिल हो चुके थे किंतु जीवन में अभी भी पतझड़ का मौसम ही विद्यमान था।शादी अपने पवित्र उद्देश्य वंशवृद्धि के साथ ही जीवन में संतुलन भी बनाये रखती है।बशर्ते बेमेल न हो। चालीस के बाद अमूमन उम्र अपना प्रभाव दिखाने लगती है जिसमे दाढ़ी से लेकर सिर तक बालों का खिचड़ी-ब्रांड हो जाना,दृष्टिदोष,जोडों की बेवफाई आदि बुराइयां विपक्ष की तरह शारीरिक सत्ता हथियाने हेतु मुखर होने लगती हैं।सन्नू जी के यौवन की लगभग खचाड़ा ब्रांड गाड़ी भी ढलान पर पहुंच चुकी थी किन्तु वैवाहिक लड्डू की सुगन्ध और स्वाद की कल्पना उनका मन प्रतिपल बेचैन किए रहती ।कहावत है कि शादी का नाम सुनकर तो मुर्दे भी उठ बैठते हैं फिर वे तो जीवित प्राणी ठहरे। कुँवारों की अन्तिम उम्मीद आषाढ़ माह में पड़ने वाली भेड़हइया नौमी भी हर बार उन्हें निराश ही करके जाती ।
गाँव के दक्षिण टोला मे उम्र का अर्धशतक पूरा कर चुके छदामी मसखरा टाइप आदमी थे”दुइ अंगुर रुकहु” उनका तकिया कलाम था। चालीस हजार रुपइया खर्च करके बंगाल से चार- पाँच साल पहले शादी कर लाए थे।एक दिन सन्नू को खरबूजे के खेत की मेड़ पर घास छीलते मिलल गए।रामजुहार के बाद उपयुक्त अवसर देखकर सन्नू ने हिम्मत करके छदामी से अपने मन की बात कह डाली।छदामी अच्छा दुइ अंगुर रुकहु, ससुराल में बात कर लें फिर बताते हैं।लड़कियां तो कई हैं।फिर उन्होंने कुछ रूपशियों की रूपराशि की चर्चा भी लगे हाथ कर डाली …।। सन्नू कल्पनाओं में ही उनमें से अपने लिए उपयुक्त षोडशी की छांटबीन करने में मगन हो गए।छदामी ने मानों सूखती फसल को बादल दिखा दिए।अब तो नाउम्मीदी के अंधकार में डूबे अरमानों को उम्मीद की किरन दिखायी देने लगी।जैसे वर्षों से सत्ता महारानी के सानिंध्य हेतु प्रयासरत पार्टी को कुर्सी प्राप्ति का सुगम मार्ग मिल गया।। ठोड़ी पकड़ते हुए बोले, दद्दा ! रोटिकरा का इंतजाम करा दो,ये जीवन तुम्हारा कर्जदार रहेगा।अब तो सुबह- शाम छदामी के दरवाजे पर हाज़िरी देना उनकी दिनचर्या हो गयी।रात को भी देर तक बैठक के बाद ही घर आगमन होता।वे रात भर भावी दाम्पत्य जीवन के हसीन ख्वाबों का कम्बल बुनते रहते।इस बीच भूसा, लहडरी(सूखी ज्वार),बाजरे की पुंजियां,खरबूजे,प्याज-लहसुन,मूंगफ़ली आदि उपहारस्वरूप बंगालन भाभी की सेवा में नित्य पेश होते रहे।क्योंकि वे उनके लिए तुरुप का इक्के की तरह थीं।
आखिर एक महीने बाद सन्नू को शुभ सूचना प्राप्त हुई कि काम हो जाएगा।
छदामी के अनुसार लगभग डेढ़ लाख रुपइया खर्च होना था।जिसमे कपड़े,जेवर और किराए के अतिरिक्त लगभग पच्चीस-तीस हजार रुपये लड़की वाले को भी खर्च हेतु देने थे। सन्नू के लिए ये कोई मुश्किल काम न था।खाने भर को गल्ला छोड़कर बाकी सब गाँव के ही आढ़ती रसूले को तौल दिया। बाकी के लिए दो भैसे थीं वो भी हटा दीं।इस प्रकार अब उनकी अंटी में जरूरत से कुछ बेसी इंतजाम हो गया था।साइबर कैफे से रेलगाड़ी के टिकटों का भी रिजर्वेशन करा लिया गया।
अब सन्नू ने अपने हुलिए की ओवरहालिंग शुरू की जिसमें बाल रँगाई से लेकर ब्यूटीपार्लर गमन इत्यादि सब शामिल रहे।निर्धारित तिथि को अंधेरे ही सन्नू छदामी और बंगालिन भौजी के साथ कलकत्ता को प्रस्थान कर गए जहां से वे उस गाँव पहुंचे जिसमें छदामी की ससुराल थी।अगले दिन सन्नू को लड़कियाँ दिखायी गयीं, जिनमें एक बीस वर्षीय कन्या उन्हें पहली ही नज़र में भा गयी।हालाँकि बुलबुल नामक यह कन्या सांवली थी किन्तु देहयष्टि और उसके तीखे नयननक़्श सन्नू को दीवाना बना चुके थे।छदामी की घरवाली ने लड़की के पिता को साधा और उन्हें विश्वास दिलाया कि उनकी बेटी राज करेगी और उसके बाल- बच्चों का भविष्य संवर जाएगा।आसामी मालदार है।इस प्रकार गरीब परिवार को मुद्रदान करके बुलबुल से उनका पाणिग्रहण करवा दिया गया।
सन्नू अपनी नयी दुल्हनियाँ के साथ घर पधारे।किन्तु अब टोला मुहल्ला सहित पूरा गांव सन्नू महाशय के स्वभाव में दृष्टिगोचर होने वाले अभूतपूर्व परिवर्तन से हतप्रभ था।उनके घर के किवाड़ अब हर घड़ी चिपके रहते और केवल उस समय खुलते जब वे बहिर्गमन करते ।बाहर जाते समय भी वे बाहर से साँकल लगाना कतई न भूलते।दरवाजे की हमेशा शोभा बढ़ाने वाले तखत और चारपायी के अब खडे या पड़े किसी भी मुद्रा में दर्शन दुर्लभ हो गए। कोई आकर किवाड़ खटखटाए ये उन्हें कतई अच्छा नहीं लगता ।भविष्य के लिए हिदायत देते हुए कहते यार गली से खड़े होकर आवाज लगाया करो।फिर भी कोई आ जाता तो चबूतरे की अपेक्षा गली में जाकर बात करना पसन्द करते।यहां तक कि बच्चों को भी दरवाजे के सामने न खेलने देते।नौधों का गली से गुजरना और दरवाजे के सामने खड़ा होना उन्हें उसी तरह फूटी आंख न भाता जैसे प्राइवेट बस वालों का अपने अड्डे के पास रोडवेज़ बस का रुकना।ये लोग इश्किया गाड़ी के लिए रेडसिगनल जो होते हैं।अब उन्होंने रिश्तेदारियों में जाना भी बिल्कुल बन्द कर दिया था।फोन से ही काम चलाते थे।जिसे वे स्वयं ही उठाते थे।वे इस बात का पूर्णरूपेण ध्यान रखते कि बुलबुल से किसी गैर की बातचीत भूले से भी न हो। वे प्रतिद्वंद्वी जमाने की नजरों से वाकिफ कंतड़ी प्राणी थे।अतः ‘हिरन फलांगे नौ शिकारी सोलह हाथ’ वाली कहावत चारितार्थ कर रहे थे।कभी शहर-कस्बा घूमने जाते और यदि कोई परिचित नौजवान मिलता तो नज़र बचाके निकल लेते।कोई दुआ-सलाम करता तो औपचारिकता निभाकर आगे बढ़ लेते।उनकी एक पांव की इस दुर्लभ चिड़िया को अशुभ दृष्टि से बचाये रखने के लिए वे पूरी एहतियात बरतते। वे स्त्रीरत्न की हिफाज़त शास्त्रानीति के अनुसार ही कर रहे थे।लगभग एक साल रो धो के गुजरा।सन्नू उफनती नदी के वेग को संभाल नहीं पाए।आखिर एक नौजवान के साथ ढलती उम्र कैसे दौड़ पाए?
अभाव असंतोष के जनक होते है जो कि चित्तवृत्तियों को दिग्भ्रमित कर डालते हैं।अंततः वही हुआ जिससे बचने के लिए उन्होंने आरम्भ से ही अतिरिक्त सावधानी का तानाबाना बुना था।अब तो रसिकों की महफ़िल उनकी गली में मधुशाला की शाम की तरह गुलज़ार होने लगी।यूँ समझो उनकी गली देश के मुर्दे नानामऊ घाट हो गयी थी। ऐरे-गैरे नत्थूखैरे चले आ रहे हैं मुंह उठाए।उन्होनें कई बार आपत्ति भी की तो ठलुहों का बहुमत एक सुर में प्रतिवाद करने लगा, “नल के पास खड़े हैं तुम्हारी जगह में नहीं”।अतः पेट्रोल मूतने की जरूरत नहीं है। बेचारे सन्नू असहायों वाली दशा को प्राप्त हो चुके थे। कई बार मन में आता कि कहीं से तमंचा ले आएं और इन सबको गोली मार दें। किन्तु थाने-दरबार से बड़ा डर लगता था । जमघट लगाए फुक्कवे दिन भर मोबाइल पर द्विअर्थी गाने बजाते और उनकी ललचाई निगाहों का केन्द्र सन्नू के किवाड़ ही होते जो कि अब उनके बाहर जाते ही स्वतः साँकलमुक्त हो जाते थे।सन्नू जब लौट के आते तो मेकअपशुदा बुलबुल को एक हाथ से किवारे थामे मुस्कराते हुए नेह- निमन्त्रण बांटते हुए पाते।किन्तु कुछ भी हो ये इंतजार उनके लिए नहीं है वे इसको अच्छी तरह समझते थे।वे आग्नेय नजरों से बुलबुल की ओर देखते लेकिन वहां परवाह किसे थी। भला बैंगन पर भी पानी रुकता है।कई बार बुलबुल के सामने इज्जत की दुहाई दी,हाथ-पैर जोड़े,किन्तु हर बार एक ही टके सा जवाब उन्हें निरुत्तर कर देता कि “तुमसे तो कुछ होता नहीं”।कुछ शब्द तलवार से ज्यादा गहरा घाव करते हैं।अब यक्ष प्रश्न ये भी था कि अपनी व्यथा किससे कहें?कुछ बातें कहते भी तो नहीं बनती हैं। प्यास मर्यादाएं तोड़ती है तो लज्जाहीन हो जाती है ।

पूरब टोला के तीस वर्षीय छैलबिहारी जो कि अपने नामानुसार ही सुदर्शन थे।दो साल पहले उनकी गृहलक्ष्मी का स्वर्गवास हो चुका था। उनका अब परमानेंट ठिकाना सन्नू की गली हो चुका था।जब देखो वहीं डटे मिलते।लाइन मिली तो अब वे घर भी आने-जाने लगे थे।एक दिन सन्नू बाहर से आए तो देखा कि छैलू खटिया पर डटे हैं और बुलबुल हँसते हुए दाना चुग रही हैं।सन्नू आपे से बाहर होने लगे तो छैलू यह कहते हुए उठ के चल दिए कि भाभी ने बुलाया था तो आ गए।इतना नाराज काहे होते हो?अब पानी सिर के ऊपर हो चुका था।इस जलालत से निजात पाने का कोई और उपाय न देखकर सन्नू ने खेत-टपरिया बेचकर भाइयों के पास शहर जाकर बसने का प्लान बनाया।चार बीघा खेत बेंच भी डाला।बाकी की रजिस्ट्री दो-चार दिन में होने को थी।किन्तु आज सवेरे उठे तो सन्न रह गए।मान-सम्मान और अरमानों पर उल्कापात करके बुलबुल माल-जेवर और समस्त मुद्राएं लेकर छैलू के साथ उनका जाल लेकर फुर्र हो चुकी थी।

ये लड्डू तो स्वाद में बड़ा कड़वा निकला।किन्तु अब वे नित्य होने वाली घनघोर बदनामी की कुढ़न और बुलबुल को खोने के डर से सर्वथामुक्त हो चुके थे।मोह ही दुःख का कारण होता है। ये बात आज उनकी समझ में अच्छी तरह आ चुकी थी।अतः वे मोहमाया को त्यागकर परमानेन्ट वैरागी हो गए।

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