शीर्षक — भूल नहीं पाता मन
वो याद आज भी मेरे हृदय पटल पर उसी तरह अंकित है जैसे तब मेरे अनसमझ मन बुद्धि चित्त में थी |
जब वें यादें स्मृति पटल पर उभरती हैं तो यूं लगता है मानों कल ही की बात हो, बहुत छोटी सी जो थे हम !
अपने परिवार को तो आज तक हम समझ ही नहीं पाए कि कौन क्या है |
कारण कि परिवार में जो संयुक्तता हमने देखी ..उसके आगे आज के परिवारों को देख कर खीझ होती है !
क्योंकि आज के छोटे से छोटे बच्चे को पता रहता है की कौन क्या है कौन किसका है
लेकिन तब ! जब हमसे पूछा जाता की तुम कितने भाई बहन हो …
तो परिवार से मिले संस्कार अनुसार तपाक से बोल देते!
सात भैया तेरह दीदी !!
आज जब दुनियादारी सीखे तब पता चला कि सबसे बड़ी मां के केवल नौ बेटियां , तीन भाई और दो बहन मंझली बड़ी मां के , तीन बेटे और एक बेटी छोटी बड़ी मां के और हम अपनी मां के अकेली क्योंकि हमारे भाई संसार में आने के कुछ क्षण बाद पुनः संसार से विदा हो गए थे
इसके बावजूद तब भी आज भी ‘ सारे परिवार का सभी के लिए प्यार एक तरफ और हम… सभी का प्यार लिए सब पर भारी वाली कहावत लिए एक तरफ
सबसे छोटी सबमें चुलबुली|
पूरे परिवार में चूल्हे भले ही सभी के अलग-अलग थे परन्तु हम भाई बहनों की थाली जब तक एक एक करके सभी के विवाह नहीं हुए तब तक वह खाने की भरी थाली एक ही रही
किसी के यहां कुछ भी या पहले बने ‘ हमें खाने से मतलब ! कोई आपस में लड़ें झगड़े ,मूंह फुलाए रूठे या मटके हम जैसे तब थे वैसे ही आज भी हैं
जो संसार छोड़ कर जा चुके हैं वो ससम्मान हृदय के स्मृति पटल पर बसे है और जो सांसारिक रूप में साथ हैं वे हृदय तल की गहराइयों से जुड़े हैं
यहां ईश्वर से प्रार्थना है कि हमेशा यूं ही रहें भी|
तो स्मरणीय बात रक्षा बंधन के त्योहार की है
मां और मंझली बड़ी मां मे जैसे आम तौर पर देवरानी जेठानी में छोटे छोटे झगड़े होते है वो हो गया सो त्योहारों पर साथ साथ बाज़ार जाने वाली ये मांए अलग अलग बाजार गईं और हम हमेशा की तरह मां के साथ हो लिए|
पहले बाजार में खिलौने के साथ एक प्लास्टिक का छोटा सा खरिदारी करने वाला बास्केट ( थैला) मिलता था वही थैला हमें खेलने के लिए मेले से सबसे बड़ी दीदी ने दिलाई थी वो हम जब भी किसी के साथ बाज़ार आदि जाते तो अपने साथ ले जाते और मां जो कुछ भी खरिदती फल या सब्जी उसमें से एक अपने बास्केट में डाल लेते
कभी कभी कोई पहचान के फल सब्जी वाले होते तो खुद से ही एक खाने की चीज मेरे बास्केट में डाल देते
हमें उस समय बहुत खुशी होती
उस दिन भी हम वो बास्केट अपने साथ ले गए थे
लेकिन उस दिन हम छोटे और अनसमझ होते हुए भी थोड़े सावधान थे क्योंकि मां बाजार अकेली आई थी हमारी नादानी बेवकूफी और किसी चीज के लिए किए ज़िद्द पर पड़ने वाली मार ड़ांट से बचाने वाली बड़ी मां साथ नहीं थी वो तो हमें डांटने वाले को उल्टा जोर से ड़ांट देती थी सो चुपचाप मां का पल्लू पकड़ कर चल रहे थे
उसी बाजार में हमारे पड़ोस के रहने वाले मोहन चाचा जी की दर्ज़ी की दुकान भी थी जो कपड़ों की सिलाई कर अपना परिवार चलाते थे
जब उनकी दुकान के सामने से निकले तो चाचाजी ने पूछा ” गुड़िया रानी क्या क्या ले आई अपने झोले में ?”हम केवल उन्हें देख कर मुस्कुरा दिए तभी हमारी नजर चाचाजी के दुकान पर टंगी हुई एक फ्राॅक पर पड़ी तो हम उसे लेकर देने के लिए झट से मां का पल्लू खींच कर बोले ” मां… मां वो….वो फ्रोक !”
मां ने कहा रूको हमें सामान लेने दो, हमने फिर से कहा ” मां फ्रोक ”
एक दो बार तो मां ने हमें सामान लेने दो या अभी रूको कहकर बहलाती रही लेकिन जब हम मां का पल्लू खींच खींच कर ज़िद्द करने लगे तो मां ने एक थप्पड़ जड़ दिया हमारे गाल पे ” सांस लेने नहीं देती “
हम खूब रोये ‘ कुछ तो जोर से थप्पड़ पड़ने के कारण और कुछ फ्रोक के न मिलने कारण |
ये बात आई गई और हो गई
रक्षाबंधन पर सुबह जब मां हमें नहला कर तैयार करने लगीं तो बाबूजी ने कहा तुम दूसरा काम कर लो ! गुड़िया को तैयार मै करता हूं
फिर बाबूजी हमें तैयार करके जब वही फ्राॅक पहनाए तो पूरे संसार भर की खुशी जैसे हमारी हो गई
उस दिन की खुशी को लिखने के लिए हमारे पास शब्द नहीं जुड़ पा रहे उस दिन उस समय वह फ्राॅक हमारे लिए सबसे कीमती सबसे बड़ा उपहार थी |
उस समय हम राखी पूजा की थाली सब भूलकर पूरे मोहल्ले का चक्कर लगाते बड़ी मां के घर पहुंच गए
हमारे यहां सभी भाई बहन राखी का त्योहार बड़ी मां के घर पर ही मिलकर मनाते हैं
आज भी जब बड़ी मां छोटी मां मंझली मां और मां भी संसार में नहीं है
बड़ी मां ने पूछा गुड़िया तेरी राखी की थाली कहां है! राखी बांधने का समय हो रहा है सब भाई आ गये!!
तो बड़ी दीदी ने बताया ” अरे मां नई फ्राॅक पहनी है ना पूरे मोहल्ले में नाच के आई है तो थाली कहां देखेगी
और सच तो यही था कि उस दिन हमे भाईयों से मिलने वाले उपहारों पैसों से कोई मतलब नहीं था जो चाहिए थी वो तो पहले ही मिल गई अब अपनी पसंदीदा वस्तु के सामने भला कौन चीज भाए !?
अब आज बड़े हो कर सोचते हैं एक चाय पान की दुकान से होने वाली कम तथा सीमित आय में उस पचास रुपए की फ्राॅक को बाबूजी कैसे लाए होंगे !?
जबकि ऐसे त्योहारों पर और भी खर्चे होते हैं ,बूआ बहनों को देने वाले उपहार बड़ों का सम्मान पूजा सामग्री नाश्ते से लेकर खाने पीने की सारी व्यवस्थाएं आदि …
बाद में पता चला कि चाचाजी ने ही घर आ कर बताया था बाबूजी को ” भैया गुड़िया बहुत रो रही थी बाजार में फ्राॅक के लिए ” समझदार हुए तो मालूम हुआ कि तीस रुपए देकर बीस रुपए उधार कर आये थे ” मोहन भाई बाकी अगले हफ्ते दे दूंगा ” कहकर
वैसे तो छोटे किसान परिवार से सम्बन्ध होने के कारण आज भी ढ़ाई सौ से पांच सौ रुपए के ऊपर का कोई कपड़ा या वस्तु खरीदने की सामर्थ्य नहीं है हममें
परंतु एक पिता के हाथों से वो फ्रोक या उस जैसी डेस ना खरीद पाएंगे ना पहन पाएंगे
वो फ्राॅक जिसे एक पिता ने अपनी कम आय की चिंता किए बिना खरीद लाए थे
वो फ्राॅक जिसमें एक पिता की वो भावनाएं थी की बेटी को पसंद आ गई है पैसों का क्या है देखा जाएगा
वो फ्राॅक जिसमें एक पिता की चिंता थी कि नहीं लिया तो बाल मन है उदास हो गया तो ..?
वो फ्राॅक जिसे पहनी तो हमने थी लेकिन उसकी चौगुनी खुशी एक पिता को हुई
ये कथन तो पहले ही पता था परन्तु अर्थ समझदार होने पर समझ आई कि शौक तो मां बाप की कमाई से पूरे होते हैं अपनी कमाई से तो जरूरतें भी शायद पूरी हों
आज दुनिया भर की दौलत इकट्ठा हो जाये लेकिन एक बाल मन की ज़िद्द पर छोटी सी दुकान चलाकर परिवार का भरण-पोषण करने वाले पिता की अपनी आय को नज़र अंदाज़ कर उस ज़िद्द को पूरा करना उन सभी दौलत से भरे पलड़े को टांग देता है ऊपर की ओर
आज बाबूजी इस संसार में नहीं हैं लेकिन एक पिता को अपने बच्चे की खुशी के लिए उभरे माथे पर चिंता की लकीरों को यदि मै टूटे फ़ूटे थोड़े से शब्दों में उतार पाई तो एक पिता के लिए मरणोपरांत कुछ श्रद्धा के सुमन से कम न होगा
वो खुशी वो यादें
सावन की यादों का अविस्मरणीय प्यार भरा वो पिटारा है जिसे मन आज भी भूल नहीं पाता |
संतोष शर्मा ” शान “
हाथरस ( उ.प्र. )
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