जम्मू-कश्मीर के लिए एक ऐतिहासिक दिन आ ही गया है, जब आखिरकार घाटी देश के बाकी हिस्सों से रेलवे लिंक के माध्यम से जुड़ जाएगी। दुनिया के सबसे ऊँचे रेलवे पुल/चिनाब आर्क ब्रिज एक तकनीकी चमत्कार है। इस पुल को बहुत सी चुनौतियों और जटिलताओं के साथ डिज़ाइन किया गया है।”आभा की पड़ोसन सहेली ने कहा।
“पहाड़ों सा पिता हो जाना नदी सी माँ के हो जाने के बाद ही जाना है।” आभा ने कहा।
“विदेश में नाम कमाकर शिखर पर पहुँचे हुए बेटे की माँ होकर आप कैसा अनुभव कर रही हैं?” अचानक पड़ोसन सहेली के पूछने पर तो आभा ने मुस्कुरा दिया और अतीत में खो गई।
“पापा! आपके सेवानिवृति में अभी डेढ़-दो वर्ष बाकी है। मैं यूँ गया और यूँ आया। विदेश में नौकरी करने का अवसर आसानी से कहाँ मिलता है…! वेतन में उछाल का अवसर खोना नहीं चाहता हूँ।” आभा के इकलौते बेटे ने जब बताया कि अमरीका में उसे नौकरी मिली है तो उसके पति को एक अनजाने भय ने घेर लिया और वे पूछ बैठे, “तो क्या अब वहीं रह जाओगे? लौटकर नहीं आओगे?”
“अभी तो नौकरी करने जा रहा हूँ। वहाँ बसने की बात तो अभी सोची नहीं। और वहाँ की नागरिकता मिलना इतना आसान तो होता नहीं।” बेटे के भाल पर की सलवटें उसकी परेशानियों की शिकायतें कर रही थीं।
“नौकरी के बहाने ही तो सब वहाँ जाते हैं और लौटकर…।” पिता के हाथों से धैर्य का सिरा छूट रहा था।
“आप ऐसा कैसे बोल सकते हैं? ऐसा सभी तो नहीं करते। लौटकर भी तो आते ही हैं लोग।” जैसा अक्सर होता आया था बेटे के समर्थन में उसकी माँ आभा का ढ़ाल बनकर खड़े हो जाना, अभी तो वक्तानुसार दस्तूर भी था। आभा साहित्यकार भी थी। वह वहाँ की साहित्यिक गोष्ठियों में शामिल होती रहती है…। एक दिन वह ‘पोयट्री ऑन ट्री’ में शामिल होने के लिए हरमन पार्क में आई थी। लगभग साठ-पैसठ रचनाकारों का जुटान हो चुका था..। दो-चार ही वरिष्ठ रचनाकार थे, बाकी सभी उन्नीस साल से तीस साल के बीच के युवा रचनाकारों का जमावड़ा था। आह्ह! रचनाकारों के बीच से भागकर, डांडिया खेलती महिलाओं की टोली की हिस्सेदार बनने की उसकी इच्छा मचल रही थी…। सोच रही थी कि कब सब चाय-नाश्ते का आनन्द लें और वह.. कि “मैं ड्रग एडिक्ट था” सुनते ही स्तब्धता से जड़ हो गई…। बाइस-तेईस साल का युवा इतनी ही बात से अपना परिचय देते हुए, अपनी हिन्दी कविता का पाठ कर रहा था..। उस युवा के हिन्दी में पाठ करने के बाद अनेक युवा रचनाकारों ने कन्नड़, उड़िया, मलयालम व अंग्रेजी में गिटिर-पिटिर किया..। अन्य दिन होता तो शायद आभा कुछ समझने-सीखने की कोशिश भी करती, आज अभी तो वह “मैं ड्रग एडिक्ट था” में ही पूरा ध्यानमग्न थी। अगर किसी चीज से घृणा आभा को था तो वह है नशा…! किसी तरह का भी हो नशा। उसके जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसकी वह अभ्यस्त हो, जिसके बिना उसका पल काटना मुश्किल हो जाये..। वह तो चाय भी नहीं पीती थी.. वह कई लोगों को देखती थी कि अगर समय पर चाय नहीं मिला तो उन्हें सर दर्द की बैचेनी या व्याकुलता से तड़पते हुए। शादी के पहले पड़ोसन भाभी ने कहा,-“आभा जी अभी हमलोगों के साथ चाय नहीं पी रही हैं, जब शादी हो जाएगी तो अपने ‘वो’ के साथ चाय पियेंगी। उन्हें तो इंकार नहीं ही कर पायेंगीं।”
“देखते हैं..!” कंधे उचकाते हुए आभा ने कहा था। मानों उसे चुनौती दी गई हो और उसने उस चुनौती स्वीकार कर लिया हो। उस बात को गाँठ बाँध कर रख ली हो जैसे और रोज याद रखती है चुनौती को। आज तक इस नाती-पोते खेलाने वाले हुए उम्र के पड़ाव पर भी चाय के लिए इंकार कर देती है…।आज भी तो इंकार करती है। जब एक युवती फ्लास्क और कप उसके सामने करती है…। चाय पीने के लिए अल्प विराम हो चुका था। सभी अलग-अलग टोली बनाकर मन की बातें साझा कर रहे थे। आभा की नजरें उस युवा को ढूँढ़ने में कामयाब रही जिससे उसे उसके नशे से वापसी का राज पता करना था। वह युवा के समीप जाकर कहती है,-“क्या मैं आपसे कुछ बातें कर सकती हूँ?”
“जरूर मैंम! क्यों नहीं!” युवा अपने साथियों से इजाज़त लेकर आभा के साथ एक जगह पर बैठ जाता है।
“पूछिये मैंम क्या जानना चाहती हैं?”
“आपने कहा ‘मैं ड्रग एडिक्ट था’.. मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि क्या कोई ड्रग एडिक्ट होकर पुनः सामान्य जीवन जी सकता है? आपको देखकर,आपको बोलते देखकर, कोई अंदाजा ही नहीं लगा सकता है कि आप कभी ड्रग एडिक्ट रहे भी होंगे!”
“आप मेरी बातों पर विश्वास कर सकती हैं आंटी..! आपसे या यहाँ किसी से झूठ बोलकर मुझे क्या फायदा हो सकता है..? ड्रग एडिक्ट कहलवाना कोई गौरव की बात, कोई शान की बात तो है नहीं!”
“ठीक है! मैं आपकी बातों पर विश्वास कर, आपकी पूरी कहानी जानना चाहती हूँ। जिसे सत्यता की कसौटी पर कसी भी जा सकेगी। आपकी आपबीती से शायद दूसरे किसी को कोई फायदा हो जाये उसको रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर प्रसारित भी करूँगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग जान सकें।”
“आंटी! आप तो मुझे अपने पापा से फिर डाँट खिलवाएँगी।” खिलखिला उठा वह युवा।
“अरे! नहीं, बिलकुल नहीं। मैं ऐसा बिलकुल नहीं चाहूँगी। अगर आपको लगता है कि आपकी कहानी छुपाकर रखनी चाहिए तो आप बिलकुल नहीं बतायें। मेरी कोशिश समाज हित के लिए है। आज हर शहर में युवा बर्बाद हो रहे हैं। उनकी ड्रग पर इतनी निर्भरता हो गई है कि छोटी सी खुशी भी नशे की मोहताज है और छोटे गम भी!”
“आपके कथन से बिलकुल सहमत हूँ आंटी। अपने अनुभव में भी यही पाया। मैं तैयार हूँ आपके प्रश्नों के जबाब देने के लिए।”
“मुझे विस्तार से जानने की इच्छा है। आप ड्रग एडिक्ट कैसे बने यानी लत कैसे लगी, लत, व्यसन में कैसे बदला, ड्रग में क्या-क्या लेते रहे, ड्रग लेने से कैसा अनुभव होता था, अनुभव से क्या परिवर्त्तन होता था, आपके अपने घर वाले, रिश्तेदार, माता-पिता, भाई-बहन के रोकने समझाने की कोशिश,कितनी कामयाब रही, ड्रग एडिक्ट की जिंदगी से सामान्य जीवन के लिए वापसी में?”
“आपको अपनी कहानी विस्तार से ही बताउँगा। उच्च स्तरीय के बच्चे जिस विद्यालय में पढ़ते थे उसी विद्यालय में मेरा नामांकन हुआ। जैसा आपने कहा आंटी कि आजकल के बच्चों के लिए छोटी सी खुशी भी नशे की मोहताज है और छोटे गम भी! उच्च स्तरीय बच्चों के जीवन में शायद ही कोई गम का मौका होता हो और खुशी का मौका ढूँढ़ने की उन्हें जरूरत नहीं होती..। उनके पास इतना पैसा और इतनी आज़ादी होती है कि हर पल ही खुशियों भरा लगता है। और नशा उनकी जरूरतों में शामिल होता है, उनको विरासत में मिलता है। उन बच्चों का साथ व दोस्ती पाने की आकांक्षा में, उनके साथ सामंजस्य बैठाने के चक्कर में, उनके दिए प्रस्ताव को अपनाने में लत लगा बैठा और लत कब व्यसनी बना देगा यह पता ही नहीं चल पाता है। ड्रग के रूप में सब वो चीज लिया जिससे नशा हो सकता है, शक्कर, शराब, सिगरेट, कोकीन, कफ सिरप, अफीम, आयोडेक्स इत्यादि। किसी चीज का नशा दिमाग के एक हिस्से ‘रिवॉर्ड सेंटर’ पर असर करता है जिससे शांति का अनुभव होता है। लेकिन उससे सोचने-समझने-भूख लगने की शक्ति छीन जाता है। अपने ही घर में चोर, झूठा बना देता है। मैं एकल बच्चा हूँ। अपने-अपने जिंदगी में व्यस्त माता-पिता का। दोनों महत्वाकांक्षी। दोनों नौकरी पेशा में। जंग लड़ते हुए घर को भी युद्धस्थल बनाये हुए। ऐसे घरों में आस-पास के समाज और रिश्तेदारों का प्रवेश निषेध होता है। मेरे ड्रग एडिक्ट होने की खबर जब तक उन तक पहुँचाई गयी, तब तक शायद बहुत देर हो गई थी। मेरी माँ बहुत रोती-समझाती। अपने को गुनहगार ठहराती रही। पिता ने सब कोशिश किया। चिकित्सक को दिखलाया, समझाया, डाँटा-पीटा भी। नशा मुक्ति केंद्र में रखा गया। ड्रग निर्भरता खत्म नहीं होना था सो नहीं हुआ। वर्षों से रोते-गाते, उलझनों में घिरी अंधकारमय जिंदगी घिसटती गुजर रही थी। एक दिन मुझे 104° बुखार था। घर के हर कोने को छान मारा कहीं कोई दवा और ड्रग नहीं दिखा। ओह्ह! बीते कल रातभर में ही तो ड्रग खत्म हो गया था। माता-पिता शहर से बाहर गए हुए थे। इतने वर्षों में कोई साथी नहीं रह गया था। अपनों का साथ तो ना जाने कबसे छूट गया था। बुखार के लिए भी दवा लानी थी। किसी तरह हिम्मत कर के घर से बाहर आया। शरीर बुखार के ताप और ड्रग की मांग से व्यथित..। व्याकुलता और उस तड़प को शब्दों में आपको नहीं बता सकता अभी। जिंदगी छीजती जाने का एहसास लिए बेहोश होकर गिर पड़ा…। घर के हाते में बहुत, -बहुत -बहुत देर बेहोश रहा। कुदरत का करिश्मा कहिए या मेरा भाग्य या मेरी माँ का आशीष। मुझे होश जब आया तब बुखार भी कम था…। उठने के लिए बहुत-बहुत श्रम करना पड़ा..। उठकर घर में आया तो तब मैं पूरी तरह होश में था। ड्रग का अंश नहीं था मेरे शरीर में, ठीक सामने वाले दीवाल में लगे शीशे में मेरा अक्स दिखा..। मैं खुद को खुद से पहचान ही नहीं रहा था..। मेरा पहिले का फोटो दीवाल पर टँगा दिखा.. ।मोबाइल में से निकाल कर फ़ोटो देखा..। घर में पड़े एलबम को निकाल कर बहुत देर तक सब तस्वीरों को देखता रहा। फिर माता-पिता का चेहरा मेरे सामने घूमता रहा..। उनके दु:ख को मैं उस पल महसूस किया। यह बातें आपको फिल्मी लग रह होगी आंटी! लेकिन यह सौ फी सदी सच बातें हैं। उसी दिन मैंने तय किया कि आज और अभी से ड्रग लेना बंद। उसके बाद से और आज का दिन मैं ड्रग को हाथ नहीं लगाया। अपने शरीर में उसका प्रवेश पूरी तरह निषेध किया। मेरे शरीर को बहुत-बहुत, बहुत कष्ट हुआ। मन से बहुत बार कमजोर पड़ा। असहनीय पीड़ा होती थी, लेकिन दिमागी मजबूती मुझे सम्भलने में मदद किया। आज आप मेरा उदाहरण देकर समाज को चेता सकती हैं। अगर आप मुझ पर विश्वास कर पाएं।”
“पूरा विश्वास कर रही हूँ आपकी बातों पर। रब करे आप सदा यूँ ही मजबूत इरादों के साथ अपनी जिंदगी गुजार पाएं।”
“आंटी मुझे भी आपसे एक सवाल करनी है, क्या कर सकता हूँ ?”
“हाँ! हाँ! बिलकुल सवाल कर सकते हैं!”
“अभी आपने जो क्षोभ शीर्षक से कविता का पाठ किया उसका सारांश था कि वे बेटियाँ बुरी होती हैं जो शादी के तुरन्त बाद अलग, अकेले जिंदगी गुजारना चाहती हैं। वो बेटियाँ कहाँ होती हैं वो तो बहुएं हो जाती हैं न?”
“शादी के बाद कहलाती तो बहू हैं, लेकिन संस्कार-परवरिश तो वे लाती हैं संग और रहती बेटियाँ ही हैं। अगर अपने को बहू मान लें तो सास-ससुर को अपना ही लें।”
“क्या यह आपका, अपना अनुभव है? क्या ऐसी बेटियाँ आज भी पाई जा रही हैं?”
“यह बिलकुल जरूरी नहीं कि लेखन में स्वयं का अनुभव हो। समाज से भी अनुभव मिलता है और लेखन में अनुभव और कल्पना का मिश्रण भी होता है।”
“आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा आंटी।”
गोष्ठी-कार्यक्रमों से मिले अनुभव से आभा के विचार प्रभावित होते रहते थे।
“बहुत लोगों को जानता हूँ, जो देश का राग अलापते रहे। लेकिन जब तक देश में रहे, तभी तक। जब विदेश गये तो बोल कर गये, बस कुछ सालों के लिए जा रहा हूँ। यूँ गया, पलक झपकते यूँ आया। लेकिन लौटकर नहीं आये। पालक पलक झपकाते-झपकाते पल गुजारते गुजर जाते रहते हैं।”
“उनलोगों से मेरी तुलना आप कैसे कर सकते हैं, जो अपनी कही बातों पर टिक नहीं पाते हैं?” अब बेटे के स्वर में झुँझलाहट दिखने लगा था।
“अभी बेटा अमरीका गया ही नहीं है और एक आप हैं कि निराशाजनक बातें करने लगे।” आभा ने अपना पक्ष रखना चाहा।
पिता ने उनकी ओर देखा और बोले, “तुम चुप रहो, क्या तुम कुछ समझती भी हो…?”
आभा को यह बात चुभ गयी और वह बोली, “नौकरी के बाद ही तो बसेरा कहाँ हो यह तय होता है। वह फिर चाहे देश में हो या परदेश में…। यह कोई नई बात तो नहीं हो रही है…। आप खुद को ही देख लीजिये…।” माँ अपने बेटे और पति के चेहरों पर पड़ रहे बल को समझने का प्रयास भी कर रही थी। उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा,“इतिहास तिहराने ही तो जा रहा है…। आपके पिता नौकरी के सिलसिले में अपना गाँव को छोड़कर नगर-नगर घूमते रहे और आप अपने को ही देख लीजिये, बूढ़े माता-पिता को छोड़कर आप भी तो नगर छोड़कर इतनी दूर महानगर में आकर बस गए…। उनके लिए तो यह भी विदेश ही रहा…। अन्त समय में न वे आ पाये न ही आप ही दर्शन कर…!” पिता के सामने उनका निरुत्तर अतीत खड़ा था… वक़्त था तो अनुभव नहीं था… अनुभव है तो वक़्त नहीं है…। पिता लू भरी दोपहरी में यह काम किया अपने पूत के लिए छाँव ढूँढ़ने में सहायक बन वट बन बैठा। इकलौता बेटे का विदेश में नौकरी करना और माता-पिता के लिए भी नागरिकता के लिए सफल प्रयास कर लेना सफल अभियान रहा। माँ आभा का अक्सर विदेश में ही रहना हो रहा था। कई वर्षों के बाद देश के महानगर के एक शादी में उसका जाना हुआथा, जहाँ उसकी पड़ोसन से भेंट हो गयी…। बात-चीत के बढ़ते क्रम में सहेली ने अचानक कहा, “सुनों न! आभा जी लौट आई हैं और अपने घर में ही रह रही हैं …!” एक नगर के आम गोला में पड़ाव पोखर के पास सिंह जी के मकान में आभा का परिवार लगभग दस-बारह वर्षों तक किरायेदार के रूप में रहा था। उस दौरान छ-सात वर्षों तक आभा अपने सास-ससुर के साथ दूसरे नगर में रहती थी, लेकिन उसके पति, उसके दोनों देवर, उसकी ननद और एक देवरानी, (एक देवर और ननद की तब शादी नहीं हुई थी) का निवास था।आभा का अपनी सास के साथ वहाँ अक्सर आना-जाना लगा रहता था। और यहीं उसकी मुलाक़ात हुई थी अपनी हमनाम आभा से। उसे वह आदर से आभा जी कहती थी। श्री सिंह के एकलौते पुत्र की पत्नी आभा जी, वृद्ध सास-ससुर की लाड़ली बहू थीं। पति की जान उनमें ही बसती थी, उनके पति उन्हें बहुत प्यार करते थे और प्यारे-प्यारे तीन बेटों की माँ थी… आभा जी। आभा जी थी तो उसकी हमनाम, लेकिन बनानेवाले ने दोनों आभा को एक दूसरे से कितना अलग बनाया था। आभा जब भी वहाँ जाड़े में जाती, तो आभा जी से जरुर मुलाकात करती। उसका लालच रहता था, स्वेटर के लिए नए-नए नमूनों की, क्यों कि आभा जी स्वेटर बहुत अच्छा-अच्छा बनाती थीं और स्वेटर बनाकर बाज़ार में बेचने के लिए भेजा करती थीं। आभा जी के घर में लक्ष्मी का सम्राज्य था। अथाह पैसों की बरसात होती रहती। ससुराल के पैतृक गाँव में अच्छी खेती से मनी का पैसा आता था। ससुर का जमा किया बहुत पैसा था। पति की कमाई शराब की दुकान से होती थी, जो बहुत अच्छी आमदनी देती थी ( तब राज्य में दिखावे वाली शराब-बंदी नहीं थी)। उनके तीनों बच्चें आभा को भाभी कहते। आभा उन बच्चों की दादी को दादी कहती, लेकिन आभा जी को दीदी ..! आभा जी का बड़ा बेटा लगभग १६-१७ साल का रहा होगा। ना जाने कब से आभा जी के पास एक लड़का (२६-२८ साल का) आता रहा होगा। उसके आने-जाने का निश्चित बिना नागा का समय होता था, शाम के ४ से ७ बजे तक, जब आभा जी के तीनों बच्चें घर से बाहर होते थे और उनके पति शराब की दुकान पर।
शाम होते आभा जी का दुल्हन की तरह सजना-सँवरना और उस लड़के के आते ही पूरे वातावरण का सुगंधित हो जाना, आभा के लिए कौतुहल का विषय हो जाता था, “वह क्यों आता है, वह क्या करता है?”
कुछ वर्षों के बाद आभा अपने पति के साथ उनके नौकरी वाले स्थान पर दूसरे नगर में रहने लगी…! उसके कुछ महीनों के बाद ही सुनने में आया कि आभाजी अपना घर छोड़कर उस लड़के के साथ भाग गयीं। वह लड़का उन्हें बंबई ले गया है, फिल्मों में काम दिलाने के लिए और कुछ वर्षो के बाद पता चला उन्हें सप्लाई करता है, कुछ वर्षो के बाद पता चला कि उसी लड़के ने उन्हें दूसरे नगर में ही रखा है …! बहुत बुरी स्थिति में हैं…! उनके दो बेटों की शादी हुई,वे नहीं आयीं…! तीसरे बेटे की शादी में आयी थीं। बीच वाले बेटे से बात होती थी, उसको एक बेटी हुई और एक बार वह बहुत बीमार पड़ी तो बेटा अपनी पत्नी के साथ अपनी बेटी को लेकर आभा जी के पास ही ठहरा था…। नगर-नगर घूमते हुए आभा जब उनके नगर में आयी तो उसे आभा जी से मिलने की बेहद इच्छा होती रही लेकिन उसे हिम्मत नहीं पड़ी कि उनसे भेंट करने जाए…। ज़ाहिर है, आभा जी अब कुलीन नहीं पुकारी जाती थीं। आभा जी के सास -ससुर गुजर गए। कुछ समय बाद सुनने में आया कि उनके पति की हत्या बड़े और छोटे बेटे ने मिलकर कर दी। मझले बेटे को भी होली के दिन भंग-शराब में जहर डाल कर मारने की कोशिश की गयी। लेकिन वह बच गया और उसने घर छोड़ दिया। लेकिन कुछ ही वर्षों में आभा जी के तीनों बेटों की मृत्यु हो गयी। आज आभा ख़ुद ज़िन्दगी के अन्तिम पड़ाव पर है तो आभा जी कहाँ हैं किन हालातों में जी रही हैं उसे नहीं पता करना! वैसे भी उनका पता बताने वाले स्रोतों से उसका सम्पर्क टूट गया है! वह अक्सर सोचा करती है कि एक ज़िन्दगी जब पूरी होती है, तब पता चलता है, ज़िन्दगी की भागने में क्या रफ़्तार थी! उसको जीवन जीने वाले का आकलन भागती ज़िन्दगी से करने का जी करता है…।
-आभा वैसी नहीं होती तो क्या ऐसा होता?
-परिणाम ही तय करता है, कब क्या करना चाहिए, क्या होना चाहिए। – इसका निर्णय आसान नहीं तो क्या आभा वक़्त के अधीन थी, इसलिए सही थी? अगर वक़्त उसकी हाथों में होता तो क्या वह गलत होती?
-आभा के नज़रिए से देखने में आभा जी की जिंदगी में कहीं कोई कमी नहीं थी। एक औरत को पति के अलावे पराये मर्द प्यार की इजाजत हमारा समाज कभी नहीं देता है, परन्तु कहते हैं ना प्यार कभी भी किसी से हो जाता है (कितना अंधा होता है) तो क्या उस प्यार का हश्र वैसा ही होता है?
-अगर प्यार नहीं था तो आभा जी की महत्त्वाकांक्षा ही होगी तो क्या महत्वाकांक्षा के लिए ज़िंदगी ने कोई उम्र नहीं तय की और बता ना भागती ज़िन्दगी क्या दहलीज पार करने का यही हश्र तो होना था?
-थोड़ा तो थम, थोड़ा ठहर जा। सही जवाब तो देती जा, ये भागती ज़िन्दगी :-“साँप-सीढ़ी के खेल में क्यों जकड़ती है तू मानव को
विभा रानी श्रीवास्तव, पटना
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