रेखा आंटी-डॉ. आरती

कमलेश द्विवेदी लेखन प्रतियोगिता -4 कहानी
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“रेखा आंटी! रेखा आंटी!” कहती हुई मैं उनके फाटक तक पहुँची। वे बाजू वाले घर में रहती थीं। वे ही मेरी सभी परेशानियों की ‘हलधर’ थीं। मतलब ‘किसान’ से नहीं, सलाहकार या परामर्शदाता थीं। मेरी फ़िलोसोफ़र, गाइड, दोस्त, उद्धारक, उबारक; सब वे ही तो थीं। सबसे बड़ी बात, वे ही मेरी राज़दार भी थीं। मेरे लिए एक सुयोग्य वर की तलाश में सारा खानदान जुटा हुआ था। कभी ननिहाल से तो कभी ददिहाल से कोई न कोई रिश्ता सुझा जाता और मेरी बढ़ती उम्र के बारे में भी चेता जाता था। अभी पिछले ही दिनों मौसी ने एक रिश्ता भेजा था। अरुण मौसी की जेठानी का बेटा था। उससे फ़ोन पर बात करने की छूट हमारे
दकियानूस परिवार ने दे रखी थी। उसका फ़ोन आते ही मेरा भतीजा सोनू मेरे पास आ, वहीं चिपक जाता। मुझे उलझन-सी
होती थी। जब रेखा आंटी को यह बात बताई थी तब वे ठहाका मार के हँसी थीं। सोनू की पहरेदारी से बचने की तरकीब भी उन्होंने ही बताई थी। मैं अपने लैपटॉप पर कार्टून फ़िल्म लगा देती। सोनू अपने कार्टून में लिप्त और मैं अपनी बातों में। “अंकल जी नमस्ते! रेखा आंटी कहाँ हैं?”राजेश अंकल को दरवाज़े से बाहर निकलते देख मैंने पूछा।

उन्होंने अंदर के कमरे की ओर इशारा कर दिया। उनका मूड कुछ उखड़ा हुआ लगा। घर में अजीब सन्नाटा था। रेखा आंटी हमेशा की तरह इधर-उधर भागती-दौड़ती काम में मग्न न दिखाई दीं। मैं अंदर तक चली गई तो वे चौंककर उठ गईं। उनके बिखरे बाल, बहता काजल, उदास चेहरा व अस्त-व्यस्त घर देख मैं मुड़कर जाने लगी मगर उन्होंने हाथ पकड़कर बिठा लिया।
झटपट मुँह-हाथ धोकर वे फालसे का शर्बत बनाकर ले आईं। “अरुण से बात हुई?” उन्होंने ही बात छेड़ी। मैंने उन्हें बताया कि अरुण से अब खुलकर बात होने लगी है। उसने अपनी पिछली प्रेमिका के सारे किस्से मुझे बताए। साथ ही यह भी विस्तार से बताया कि कैसे उनके बीच में दूरियाँ बढ़ीं और किस कारण वे अलग हो गए। “सुनकर तुम्हें कैसा लगा? मिनी!” रेखा आंटी ने मेरे हाथ से खाली गिलास लेकर ट्रे में रख दिया। “आंटी वह ईमानदार है और हमारे रिश्ते में मुझसे भी पूरी ईमानदारी चाहता है। उसका गला भर आया था बताते समय।” बताते हुए मैं भी भावुक हो उठी। “हम्म! तुम्हारे रुई से कोमल मन ने उसके सारे आँसू सोख लिए हैं। पर तुम उसके मन का नमक जाँच सकोगी क्या?” रेखा आंटी के बेतरतीब बने जूड़े से बिखरे बाल भी सवाल कर रहे थे। “मैं भी सोच रही हूँ कि हमारे संबंधों की गृहस्थी सच की नींव पर खड़ी हो।” यही मेरा आज का प्रश्न भी था रेखा आंटी से।

“सच तो पानी की तरह है- निर्मल, पारदर्शी। सच की बहती धार जिसमें मिले, वैसी हो जाती है। दूध में मिलकर संवर्धक, अमृत में मिलकर जीवन और विष में मिलकर मृत्यु।” रेखा आंटी धारा प्रवाह बोलीं। “नीरज से पुराने प्रेम और ब्रेक-अप के बारे में मैं भी अरुण को बता दूँ, न?” मुझे दृढ़ विश्वास था कि रेखा आंटी मुझसे सहमत होंगी। “मिनी! तुम्हारे मन ने सीमेंट बनकर उसके सच के जल को अपनाया। कहीं अरुण का हृदय रेत का निकला, तो? … गृहस्थी की दीवार भरभरा कर गिर सकती है।” रेखा आंटी की कटे नींबू जैसी आँखें कुछ पनीली हो आई थीं। “रेखा आंटी! आपने तो कभी झूठ बोलने की सलाह नहीं दी थी। आपने स्वयं राजेश अंकल को …” मैं हैरान थी। “काश! नींव में गहरे दफ़नाया होता उस किस्से को तो आज मेरी छत अधिक मजबूत होती।” उनका आहत हृदय बोल उठा। “काश! आपकी भी कोई रेखा आंटी होतीं।” मेरे मुँह से निकला।

-डॉ. आरती ‘लोकेश’ -दुबई, यू.ए.ई. Mobile: +971504270752

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