मंजिल : संघर्षों का सफर
छोटे से कस्बे की संकरी गलियों में बचपन बिताने वाली अनाया के सपने आसमान जितने बड़े थे। उसकी आंखों में चमक थी । ऐसी चमक, जो हर कठिनाई को मात देने का साहस रखती थी। घर की चारदीवारी में पली-बढ़ी अनाया जानती थी कि एक लड़की का सफ़र आसान नहीं होता, पर उसके लिए यही कठिन राह उसकी पहचान बनाने का जरिया थी।बचपन से ही वह पढ़ाई में तेज़ थी। किताबें उसकी सबसे अच्छी दोस्त थीं। पर समाज की सोच, मानो उसके पंखों को काटने पर आमादा थी। कई बार रिश्तेदार तंज कसते—”लड़कियां ज्यादा पढ़-लिखकर क्या करेंगी?”
“अच्छा रिश्ता आए, तो जल्दी ब्याह दो।”
अनाया मुस्कुरा कर ये बातें सुन लेती, लेकिन दिल में संकल्प और मजबूत हो जाता—”मैं अपनी मंज़िल खुद तय करूंगी।”जब उसने उच्च शिक्षा के लिए शहर जाने की ठानी, परिवार में तूफ़ान आ गया। मां उसके साथ थीं, पर कई लोग बोले—”शहर का माहौल अच्छा नहीं, लड़की अकेले कैसे रहेगी?” अनाया न झुकी, न टूटी। उसने कहा और घरवालों को समझाया—”संस्कार मेरा कवच हैं, मेरी मेहनत मेरा हथियार। गलत रास्ते पर मैं नहीं जाऊंगी।” वह शहर गई, छात्रावास में रही, और पढ़ाई में अव्वल आने लगी। वहीं रहते हुए उसने महसूस किया कि केवल खुद आगे बढ़ना काफी नहीं, उन लड़कियों के लिए भी कुछ करना होगा जो हालात से हार मान लेती हैं। कॉलेज में उसने महिला अधिकारों पर भाषण प्रतियोगिता जीती। उसकी एक पंक्ति सबके मन में उतर गई—”नारी की जड़ें परंपरा में हों और उड़ान आधुनिकता में — तभी विकास सच्चा होगा।” यही सोच लेकर पढ़ाई खत्म करने के बाद उसने एक संस्था बनाई, जो गाँव-गाँव जाकर लड़कियों को शिक्षा, आत्मरक्षा और आत्मनिर्भरता का प्रशिक्षण देने लगी। अनाया का काम आसान नहीं था। कई जगह लोगों ने विरोध किया, उसके चरित्र पर सवाल उठाए, मीटिंग्स बिगाड़ दीं। लेकिन वह मुस्कुराती और कहती—
“जिसे मंज़िल की तलाश हो, वह पत्थरों से नहीं डरता।”
धीरे-धीरे उसका नाम फैलने लगा। अखबारों में उसकी कहानियाँ छपने लगीं, टीवी पर साक्षात्कार होने लगे। पर उसके लिए असली इनाम वह पल था, जब एक गाँव की लड़की ने आकर कहा—
“दीदी, आपकी वजह से मैंने पढ़ाई छोड़ी नहीं।”
अनाया जानती थी कि यही उसकी असली जीत है — जब एक-एक जीवन बदल जाए। संघर्ष, आत्मविश्वास और मेहनत—ये तीन शब्द अनाया के जीवन के मंत्र बन गए। और आज, वह हर उस लड़की के लिए रोशनी का दीपक है जो अंधेरे में रास्ता खोज रही है।
संदेश :
अनाया की कहानी यह सिखाती है कि औरत केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं। वह संस्कारों को संजोकर, मर्यादा का पालन करते हुए भी दुनिया में अपनी जगह बना सकती है। आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं — बस संतुलन की जरूरत है।
मीना जोशी ‘मनु’
हल्द्वानी, उत्तराखण्ड
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