प्यार की जुबां
सर्दी की ठंडी सी सुबह थी । आशा ने दरवाजा खोल कर बाहर झांका। चारों तरफ धुआँ – धुआँ लग रहा था । मानो प्रकृति ने ठंडी चादर ओढ़ रखी है । आर-पार नजर ही नहीं आ रहा था । मुँह से भी भाप सी निकल रही थी ।अंधेरा अभी पूरी तरह छँटा नहीं था । आशा ने अपना शाल उठाया और ओढ़ लिया । रसोई घर में जाकर गैस पर चाय का पानी चढ़ा दिया । जब तक पानी उबलता , आशा ने सोचा कुछ और काम भी निपटा लूँ। बाहर निकलने ही वाली थी की रसोई घर की खिड़की की तरफ नजर गई । देखा कि एक प्यारा सा कुत्ते का पिल्ला ठंड में पेड़ के नीचे मानो सिकुड़ कर पड़ा था । कुई कुई की हल्की सी आवाज कानों में आ रही थी । ऐसा लग रहा था मानो ठंड के मारे उसकी आवाज भी नहीं निकल रही थी । आशा को बड़ी दया आई । रसोई घर का दरवाजा खोलकर वह बाहर निकली । सीधे उसे पेड़ के नीचे गई और उसे छोटे से पिल्ले को उठाकर उसने शॉल के नीचे छुपा लिया । वह भी मानो गर्माहट प्रकार निश्चित होकर शॉल के अंदर दुबक गया । आशा उसे लेकर अंदर आ गई ।चाय का पानी उबल गया था । पत्ती डालकर चाय भिगो दी और फिर बैठक में रखे पायदान को थोड़ा सा सरका कर पिल्ले को उसे पर डालकर उसके लिए थोड़ा सा दूध गर्म करने चली गई । एक हाथ में अपनी चाय और दूसरे हाथ में गर्म दूध की कटोरी लेकर आशा बैठक में आई और उसे पिल्ले के आगे कटोरी सरका दी । देखते ही देखते चुक-चुक कर वह सारा दूध पी गया । आशा साथ वाले सोफे पर बैठकर चाय की चुस्कियाँ भी लेती रही और उसे पिल्ले को दूध पीता देखती रही । धीरे-धीरे वह आशा की आदत और उसके जीवन का हिस्सा बन गया । दो साल पहले तक आशा का भरा – पूरा परिवार था । दिल का दौरा पड़ने से अचानक दो साल पहले पति गुजर गए । आशा अभी संभाल भी ना पाई थी कि एक सड़क दुर्घटना में उसके बेटे का भी देहांत हो गया । बेचारी आशा ! इतने बड़े पहाड़ सम जीवन को कैसे जिए यही सोच – सोच कर वह उम्र से कहीं ज्यादा बड़ी दिखने लगी थी । ऐसे में जब वह कुत्ते का पिल्ला उसके जीवन में आया तो वह पता नहीं कैसे उसके जीवन का एक अहम हिस्सा बन गया, उसे पता ही ना चला । दिन बीते गए सर्दियाँ भी खत्म हो गईं थीं । मिल्की (यह नाम उसने उसे पिल्ले का रख लिया था ) भी अब बड़ा हो गया था । शॉल स्वेटर सब अलमारी से हटकर फिर से ट्रंक के अंदर बंद हो गए थे । दिन बड़े और रातें छोटी होने लगी थीं । आशा ने सोचा क्यों ना इस बार गर्मियों में मिल्की को साथ लेकर पहाड़ों की सैर कर आए ? फिर क्या था ! आशा ने शिमला जाने का कार्यक्रम बनाया और होटल भी बुक कर लिया । निश्चित दिन वह मिल्की के साथ टैक्सी में बैठकर रवाना हो गई । तीन घंटों का सफर और मिल्की और आशा शिमला की वादियों में पहुँच चुके थे । कितना सुंदर दृश्य था पहाड़ों का ! होटल में सामान रखकर आशा मिल्की को साथ लेकर मॉल रोड़ की तरफ निकल पड़ी । दोनों खूब घूमें । अचानक छिटपुट बारिश शुरू हो गई तो आशा मिल्की के साथ होटल लौट आई । मिल्की को उसने पास रखे गलीचे के ऊपर बैठने को कहा और खुद बेड पर बैठकर चाय का आर्डर अपने लिए और मिल्की के लिए दूध और ब्रेड मंगवाया । धीरे-धीरे रात बढ़ने लगी । कमरे की लाइट बुझाकर वह और मिल्की सोने की तैयारी में थे । वहाँ ठंड थोड़ी ज्यादा होने के कारण उसने मिल्की को अपने साथ ही बेड पर सुला लिया । कभी-कभी ज्यादा लाड लगाने के कारण वह ऐसा कर लेती थी । देर रात को अचानक मिल्की के भोंकने से आशा की नींद खुल गई । कमरे में अंधेरा था और मिल्की भौंक रहा था । उसे डाँट भी लगाई पर वह चुप होने को ही नहीं आ रहा था । आशा को हैरानी हुई कि मिल्की क्यों इतना परेशान हो रहा है ? जैसे – तैसे कंबल से हाथ निकाल कर आशा ने लाइट जलाई । लाइट जलाकर क्या देखती है ! एक साँप फन उठाकर बेड के नीचे सामने खड़ा है । मिल्की को शायद अँधेरे में ही उस स साँप के सरसराने की आवाज आ गई थी । तभी वह इतना जोर से भौंक रहा था । लाइट जलाते ही मिल्की कंबल से निकलकर फुर्ती से उस साँप के ऊपर टूट पड़ा । बहुत डर गई थी आशा ! जोर-जोर से चिल्लाने लगी । उसकी चीख पुकार सुनकर होटल के कर्मचारी व अन्य कमरों में रुके मेहमान निकल पड़े !देखते ही देखते वे आशा के कमरे में इकट्ठा हो गए । किसी तरह लाठियों और अन्य औजारों की सहायता से साँप को मार गिराया । मिल्की हांफ रहा था । आशा भी डरी हुई थी । उसने एकदम मिल्की को गोदी में उठा लिया और सीने में भींच लिया । आशा रो रही थी । मिल्की आशा की गोदी में एक शांत बच्चे की तरह पड़ा था ।आशा सोच रही थी कि उसने केवल ही सुना था कि कुत्ते बहुत वफादार होते हैं पर आज उसे इस बात का प्रमाण मिल गया । उसने मिल्की को अपनी गोदी में भींच लिया ।
शकुंतला (चंडीगढ़)
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