वह दीपावली-मनोरमा जैन पाखी

वह दीपावली-मनोरमा जैन पाखी 

कमलेश द्विवेदी लेखन प्रतियोगिता -4 संस्मरण 
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स्मृतियों की एक खूबी होती है जरा सा भी अनुकूल वातावरण मिलता है तो छम छम करती चली आती हैं। प्रसंगवश #वह दीपावली मैं शायद ही कभी भूल पाऊँ।    सन् 1987 की दीपावली थी ।हर साल की तरह वही सारे घर की सफाई,पुताई। पूजनघर में गोबर से लीपना ,रंगोली बनाना और दीये सजाना,बड़ा पीतल का दीवल माँज कर चमकाना और पूजन गृह में सजाना.मेरी हर साल की जिम्मेदारी थी। सारे काम हो रहे थे पर कहीं कोई कमी थी। एक आवाज हर पल गूंजती महसूस होती थी “अरे…जल्दी जाकर दीये धोकर धूप में रख दे..सूख जायेगे तो तेल नहीं पियेंगे।””कहाँ खोई है,बाद में पढ़ लेना…देख जरा साखें (नमकीन मठरी) नमक ठीक है ? …..खोये की बरफी ..बेसन की बरफी ….।चल मिक्सर नमकीन तू बना दे…तेरे दादा (पापा)  को पसंद है।” 
पर उस बार घर में मिठाई बनी मेरे द्वारा रसगुल्ले और बेसन की बरफी। मिक्सर नमकीन और मठरी। बाकी मिठाई के लिए भाभी ने बोल दिया कि मटकी सजवा लाना ।यानि बाजार से मिठाई मटकी में तब पैक की जाती थी दीपावली पर। हमने हर साल की तरह पूजन स्थल सजाया पर न तो रंगोली बनाने में मन लगा न पारंपरिक आटे हल्दी का चौक पूरने में।बार बार आँखें भीगी जा रही थीं।पूजन का समय हो गया। सभी लोग आ गये। पापा के कहने पर चाचा चाची को भी बुला लिया। मम्मी हमेशा अपने देवरों देवरानियों और उनके बच्चों को बुलाया करती थीं। और जो भी उनके पास जमा पूंजी होती उसमें से बच्चों को दिया करती थीं।सभी लोग जमा थे। अगर नहीं थी तो मेरी माँ। पापा ने पूजन के लिए चौक की तरफ कदम बढाये और फफक कर रो पड़े। सभी लोग रो रहे थे …फिर चाचा ने कहा कि पूजन कर लो।पर पापा ने मना कर दिया। भैया को कहा पूजन करने को। पर माहौल उस अनुपस्थित इंसान की कमी से इतना गमगीन हो चुका था कि पूजन का मन न हुआ।
भैया पापा से कह रहे थे और पापा भैया से। आखिर पापा ने कहा ” अब आज से घर की जिम्मेदारी तुम्हारी। तुम्हारी मम्मी थी तो पूजन और त्यौहार का कोई अर्थ था।आज महसूस हो रहा है घर में उनकी अहमियत क्या थी।…”फिर भैया ने पूजन की। पर एक कसक सबके मन में थी। वह आखिरी दीवाली थी जब छोटे चाचा चाची ,बड़ी चाची पूजन में शामिल हुये।बड़े चाचा जी नहीं। उन्होंने कभी भी माँ को वह सम्मान न दिया जो बड़ी चाची देती थीं। उसके बाद न किसी से दीवाली पर या त्यौहार पर बुलाया न आये। शायद मम्मी सब को जोड़ने की कला जानती थी।हर दीपावली पर तुम आज भी इतने सालों बाद  याद आती हो मम्मी। फिर वही दीवाली ..वही काम पर तुम नहीं हो।तुम्हारे बिना 35वीं दीवाली है। जहाँ भी हो बस..आशीष देना कि तुम्हारी बेटी भी आखिरी साँस तक सबको जोड़ कर रख सके।

 मनोरमा जैन पाखी,मेहगाँव,जिला भिण्ड, मध्यप्रदेश   

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